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जिन कंपनियों ने भारत को आत्मनिर्भर बनाया उसे बेचकर आत्म-निर्भर बनने की बातें

CHHATTISGARH:आत्म-निर्भर भारत सुनने बड़ा स्वाभिमानी और सकारात्मक है। अगर भारत की अर्थव्यवस्था की बात करें तो यह बोलने जितना आसान नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था स्वयं इतनी जटिल है कि आत्मनिर्भरता शब्द पर अनवरत बिना ठोस नतीजे पर पहुँचे बहस हो सकती है। इतना लेकिन ज़रूर समझ में आता है कि देश के उत्थान में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का बड़ा हाथ रहा है। जिनमें नवरत्न कंपनियाँ भी शामिल है, सरकार इन कंपनियों मंव अपनी हिस्सेदारी बेच रही है। कोरोना संकट से पहले ही देश में आर्थिक संकट गहराया हुआ था। घाटे में चल रही कंपनी को उठाने की बजाय उन्हें बेचकर मोदी सरकार अपने दोस्तों की कंपनी का उद्धार करने में लगी हुई है।
उदाहरण के लिये कॉनकोर इंडिया यानि कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया। यह भारत सरकार की नवरत्न कंपनियों में से एक है। इस कंपनी को सबसे अधिक मुनाफा देने वाली भारत की नवरत्न कंपनी माना जाता है। इसका गठन 1988 में 83 करोड़ की लागत से कंपनी एक्ट के तहत हुआ था। आज इस कंपनी की नेट वैल्यू 32 हजार करोड़ है। इस कंपनी से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रुप से 10 लाख लोग जुड़े हुए हैं। ऐसी कंपनी को भारत सरकार निजी हाथों में सौंपने जा रही है।
कॉनकोर के अलावा एयर इंडिया (Air India), कोल इंडिया (Coal India), ओएनजीसी (ONGC), एलआईसी जैसी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी भारत सरकार बेचने जा रही है।
एक समय दूरसंचार के क्षेत्र में बीएसएनएल और एमटीएनएल देश की सबसे बड़ी कंपनी थी। जिसे 3जी से आगे बढ़ने ही नहीं दिया गया। रिलायंस जियो के विज्ञापन के लिये स्वयं प्रधानमंत्री मोदी जी उतर गये। सरकारी कंपनियों को नुकसान में लाकर, फायदे वाली कंपनियों को बेचकर मोदी जी कैसा आत्मनिर्भर भारत बना रहे हैं।
देश की दूसरी बड़ी पेट्रोलियम कंपनी 55 हजार करोड़ रुपये मूल्य वाली बीपीसीएल है। जिसमें भारत की सरकार की हिस्सेदारी 53.3 फीसदी है। इस कंपनी में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचकर सरकार का लक्ष्य 65 हजार करोड़ रुपये की उगाही करने का है। सरकार ने गुपचुप तरीके से उस कानून को खत्म कर दिया है, जिस कानून से कंपनी का राष्ट्रीयकरण हुआ है। ऐसे में कंपनी निजी हाथों में बेचने के लिए संसद से मंजूरी नहीं लेनी पड़ेगी।
कोरोना संकट और लॉकडाउन के कारण देश की छोटे व मध्यम क्षेत्र के उद्यम समाप्ति की कगार पर हैं। इन्हें राहत के नाम पर कर्ज़ पकड़ाया जा रहा है। देश का श्रमिक वर्ग सड़कों पर पैदल चलने पलायन करने पर मज़बूर है। वो कैसे आत्मनिर्भर बनेंगे जिन पर निर्भर कंपनियां व उद्योग आज बंद पड़े हैं। उन्हें कर्ज़ दे भी दिया जाये तो लौटाएंगे कैसे? जब लगातार कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं तो अर्थव्यवस्था सामान्य कैसे होगी? मोदी सरकार का आत्मनिर्भर भारत दूर की कौड़ी है, हाल की परिस्थितियों में श्रमिक व एमएसएमई का विश्वास वापस लाने की ज़रूरत थी। लोगों की जेबों में पैसे रखने की ज़रूरत थी जिससे अर्थव्यवस्था का पहिया घूमना शुरू होता। तब कहीं जाकर श्रमिक वर्ग और छोटे व्यापारी आत्म-निर्भर बनने की सोच सकते थे। लोगों को कर्ज़ के बोझ तले दबाकर, सार्वजनिक क्षेत्र की मुनाफे वाली कंपनियों को बेचकर आत्म-निर्भर बनने का ज्ञान देना जले पर नमक छिड़कने जैसा है। श्रमिकों की पीड़ा को नज़रअंदाज़ करके आत्मनिर्भर होने की नहीं सोची जा सकती।
आलेख- आदित्य भगत

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